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रायपुर|राजधानी के काठाठीह स्थित कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता एवं जनसंचार विश्वविद्यालय के छात्र-अंकित तिवारी ने यहां के प्रोफ़ेसरों को फर्जी और भ्रष्ट बताया है,साथ ही इसे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यों का गढ़ भी बताया है|उचित कार्यवाही कि मांग को लेकर,उन्होंने राष्ट्रपति,प्रधानमंत्री,कुलाधिपति और कुलपति को एक पत्र लिखा है|

माननीय
महामहिम राष्ट्रपति/माननीय प्रधानमंत्री/कुलाधिपति महोदया/कुलपति महोदय कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता एवं जनसंचार विश्वविद्यालय रायपुर की स्थापना मूर्धन्य पत्रकार स्वर्गीय भारत रत्न अटल बिहारी बाजपेयी के कर्मयोगी कुशाभाऊ ठाकरे के नाम पर 2005 में बड़े सपनों के साथ की थी|बाजपेयी जी चाहते थे कि-पत्रकार समाज की आवाज बने| पत्रकारिता विश्वविद्यालय रायपुर छत्तीसगढ़ शिक्षण संस्थान की राह पे कभी न चलकर,राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की राह पर अनवरत अग्रसर है|पिछले लगभग 4 सालों से विश्वविद्यालय के कुलपति पद पर डॉ.मानसिंह परमार आसीन हैं|इसके पहले विश्वविद्यालय के चर्चित संघ के कार्यकर्ता कुलपति-सच्चिदानंद जोशी रह चुके हैं|श्री जोशी ने पत्रकारिता विश्वविद्यालय को जिस तरह से संघ की शाखा के रूप में तब्दील करने की कवायद की,वह अपने आप में बेमिसाल है|विश्वविद्यालय जहां धर्मनिरपेक्ष संस्थान और सरकार से अलग रहकर चलने वाली संस्था होती है, वहीं पत्रकारिता विश्वविद्यालय रायपुर के कुलपति साहब और तमाम प्रोफ़ेसर बीजेपी के विचारों को आगे लेकर संघ की राह पर चलते रहे हैं|आए दिन संघ से जुड़े हुए कार्यक्रम विश्वविद्यालय परिसर में कराए जाते रहे हैं,जिसमें मुख्य वक्ता राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े हुए लोग या पदाधिकारी होते हैं और उस कार्यक्रम का संचालन विश्वविद्यालय के किसी न किसी प्रोफ़ेसर द्वारा किया जाता रहा है|विश्वविद्यालय में शिक्षकों की कमी को पूर्ण करने के लिए 2005 में शैक्षणिक पदों के साथ रीडर पद की संविदा नियुक्ति के लिए विज्ञापन जारी किया गया था|इसके लिए पत्रकारिता में स्नातकोत्तर उपाधि,पीएचडी या 8 वर्ष शैक्षणिक अध्यापन या पत्रकारिता के क्षेत्र में 10 वर्ष का अनुभव जरूरी था|डॉ.शाहिद अली अपना पत्नी डॉक्टर गोपा बागची एसोसिएट प्रोफेसर केंद्रीय विश्वविद्यालय बिलासपुर के माध्यम से फर्जी अनुभव प्रमाण पत्र बनाकर रीडर के पद पर भर्ती हो गया और 2008 में रीडर पद के पद पर नियमित हो गया|डॉ.अली बड़े ही मंझे खिलाड़ी हैं, पर क्या करें नकल के लिए अक्ल की जरूरत होती है|अली कहते हैं कि-वे एम.ए.पत्रकारिता की डिग्री सौराष्ट्र विद्यापीठ से 1997 में पूरी की है और गुरु घासीदास विश्वविद्यालय बिलासपुर में कोर्स संयोजक और अतिथि प्राध्यापक के पद पर 1995 से ही अध्यापन का अनुभव माना गया|यह व्यक्ति एम.ए.पत्रकारिता की डिग्री बाद में पूरी करता है,प्राध्यापक पहले बन जाता है और 1 साल के बीजेएमसी के आधार पर अतिथि प्राध्यापक बन गया|अली यहीं नहीं रुके वे गुजरात विद्यापीठ का रिफ्रेशर कोर्स का प्रमाण पत्र भी 1997 में फर्जी प्रमाण पत्र खुद के द्वारा हस्ताक्षर कर,मोदी जी के गुजरात को पलीता लगाने में पीछे नहीं हटे|धन्य हैं कुलपति-जोशी और मुख्यमंत्री-डॉ.रमन सिंह की पूरी लुटेरी टीम गजब का शिक्षा के गाल पर तमाचा है,जिसे शैलेंद्र खंडेलवाल ने अदालत में चुनौती दी|अदालत ने केंद्रीय विश्वविद्यालय बिलासपुर से पूछा कि-क्या डॉ.अली को जारी किए गए प्रमाण पत्र सहीं हैं और यह प्रमाण पत्र विश्वविद्यालय प्रशासन ने भी जारी किया है?इस पर गुरु घासीदास विश्वविद्यालय प्रशासन ने लिखित में जानकारी देते हुए कहा कि-डॉ.शाहिद अली ने कभी भी गुरु घासीदास विश्वविद्यालय बिलासपुर में शिक्षक के पद पर अस्थाई या स्थाई तौर पर कभी भी कार्य नहीं किया है|अतः डॉ.शाहिद अली की पत्नी और गुरु घासीदास विश्वविद्यालय की जनसंचार विभाग की एसोसिएट प्रोफेसर डॉ.गोपा बागची द्वारा प्रदान की गई अनुभव प्रमाण पत्र पूरी तरह से फर्जी है,जिसके आधार पर अदालत ने डॉ.शाहिद अली के प्रमाण पत्रों को फर्जी मानते हुए धोखाधड़ी का प्रकरण पंजीबद्ध कर,धारा 420,467,468,471 और 34 भादस के तहत दंडनीय अपराध के तहत किया|साथ ही शैलेंद्र खंडेलवाल द्वारा किए गए शिकायतों के आधार पर तत्कालीन सामान्य प्रशासन की सचिव निधि छिब्बर ने अपने जांच में पाया कि-डॉ.शाहिद अली की नियुक्ति प्रक्रिया में यूजीसी के मापदंडों को ताक में रखा गया है और उक्त रीडर की नियुक्ति पूरी तरह से नियमों के विरुद्ध है और डॉ.अली द्वारा उपलब्ध शैक्षणिक एवं अनुभव प्रमाण पत्र पूरी फर्जी है|डॉ.शाहिद अली ने अपनी नियुक्ति को जायज ठहराते हुए,अपने निर्देशन में पीएचडी की सीटों का विज्ञापन जारी कराकर,भूतपूर्व मुख्यमंत्री रमन सिंह के खास ओएसडी विक्रम सिसोदिया की पत्नी श्रीमती कीर्ति सिसोदिया (पीएचडी शोधार्थी) ने यूजीसी के नियमों को ताक में रखकर बिना किसी उपस्थिति,हस्ताक्षर व Plagiarism Certificate प्राप्त किए बिना भारत की सबसे बड़ी डिग्री हासिल कर ली है|

विज्ञापन एवं जनसंपर्क विभाग के सहायक प्रोफेसर पद पर कार्यरत डॉ.आशुतोष मंडावी एवं प्रबंधन अध्ययन विभाग के सहायक प्रोफेसर डॉ.अभिषेक दुबे तो कुशाभाऊ ठाकरे के शोधार्थियों से दो कदम आगे निकल गए|डॉ.आशुतोष मंडावी ने अपनी पीएचडी लगभग एक दशक में केंद्रीय विश्वविद्यालय बिलासपुर से फर्जी प्रमाण पत्र बांटने के जुर्म में निलंबित डॉ.गोपाल जी के निर्देशन में पत्रकारिता विश्वविद्यालय में नियमित अध्यापन कार्य करते हुए बिना किसी शोध अवकाश व शोध प्रबंधन को बिना Plagiarism Certificate के अपने राजनीतिक पहुंच बीजेपी शासन काल में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के प्रदेश अध्यक्ष के पद पर लगातार 4 वर्षों तक वर्तमान में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य के पद पर कार्यरत होने एवं संघ के प्रांत प्रचारक दीपक विश्पुते के सिफ़ारिश के कारण केंद्रीय विश्वविद्यालय बिलासपुर एवं यूजीसी को गुमराह कर,पीएचडी की डिग्री हासिल कर लिया|सहायक प्रोफेसर आशुतोष मंडावी को कुलपति जोशी ने संविदा प्राध्यापक के रूप में नियुक्त किया था और 2008 में जोड़-तोड़ से नियमित हो गए|आशुतोष मंडावी अपने ज्ञान के लिए मशहूर हैं,जिन्हें ना लेखन आता है,ना पढ़ाना|अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद जैसे प्रबुद्ध संगठन ने किस आधार पर उनका चयन किया?यह सोच का विषय है|जो व्यक्ति अपने विषय पर रत्ती भर ज्ञान नहीं रखता,वह किसी विचारधारा को कैसे आगे बढ़ा पाएगा?जहां इस व्यक्ति की चोरी पकड़ी जाती है,तो अपने राजनीतिक पहुंच और वर्तमान में अध्यक्ष होने का भय दूसरी विचारधारा के छात्रों को दिखाने लगता है|छात्रों के बीच कामचोर और बुद्धि हीन गुरु के नाम से लोकप्रिय है, इतना ही नहीं अधिक गुणी व्यक्तित्व के होने के कारण आशुतोष मंडावी को कुलपति जोशी ने हॉस्टल वार्डन,स्पोर्ट्स ऑफिसर भी बना दिया था,जिससे वे विश्वविद्यालय को संघ और बीजेपी के आत्म परिसर बना सकें|आशुतोष मंडावी विश्वविद्यालय के भव्य समवेत में हर सप्ताह एबीवीपी की कार्यकारिणी मीटिंग भी करते हुए मिल जाते थे|क्या विश्वविद्यालय के कुलपति ऑफिस,प्रशासनिक भवन और प्रोफेसर के केबिन में जितना अधिकार विश्वविद्यालय के कर्मचारियों और अधिकारियों का है,उतना ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का भी है?अगर नहीं तो फिर आज तक लगातार हो रहे असंवैधानिक तरीके से मीटिंग और शिक्षकों की भागीदारी पर कुलपति ने कोई कानूनी कार्यवाही क्यों नहीं की?क्या इसका मतलब यह नहीं मान लेना चाहिए कि-मिली जुली सरकार चलती रही है?इतना ही नहीं आशुतोष मंडावी ने विधानसभा चुनाव की आचार संहिता की जमकर धज्जियां उड़ाई|उनके निर्देशन में प्रदेशभर के स्कूलों और कॉलेजों में नारी आत्म रक्षा के नाम पर कराटे और आत्मरक्षा के गुर सिखाने का कार्यक्रम चुनाव के समय चलाया गया,जिसमें बीजेपी और संघ के एजेंडे का खुलेआम प्रचार किया जाता रहा|प्रशासन में सीधा दखल होने के कारण किसी भी संस्थान और संवैधानिक संस्थाओं ने इस तरह के कार्यक्रम में रोक लगाने की हिम्मत नहीं दिखाई|इसकी सत्यता की पुष्टि विभिन्न समाचारों में विधानसभा चुनाव के समय नारी आत्मरक्षा के लिए हुए प्रशिक्षण के कार्यक्रमों से संबंधित खबरों को देख सकते हैं|

पत्रकारिता यूनिवर्सिटी में दो छात्र संगठन हैं,जिसमें विवाद एनएसयूआई के छात्रों को लेकर खड़ा हुआ था|एनएसयूआई के पदाधिकारी यूनिवर्सिटी में खुलेआम आयोजित आरएसएस के कार्यक्रम जिसमें राहुल गांधी मुर्दाबाद,सोनिया गांधी मुर्दाबाद,मनमोहन सिंह मुर्दाबाद,कांग्रेस पार्टी मुर्दाबाद के नारे लगाए जा रहे थे|इसका विरोध करने कुलसचिव के पास गए और आशुतोष मंडावी ने पुलिस प्रशासन को अपने अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद का अध्यक्ष होने का धौंस देते हुए,एनएसयूआई समर्थित छात्रों को विश्वविद्यालय में तोड़फोड़ के आरोप में जेल पहुंचा दिया|क्योंकि ये छात्र श्री मंडावी के नियुक्ति और संघ समर्थित कार्यक्रमों को हमेशा चुनौती देते रहते थे|जग जाहिर है कि-आशुतोष मंडावी अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद जैसी संस्था के लिए काबिल नहीं हैं|वे अपनी नियुक्ति को बचाने के लिए संघ और अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के वोट में छुपकर अपनी राजनीति करते रहे हैं|वर्तमान में बीजेपी की सरकार बदलने के बाद अपने आप को कांग्रेसी बताने लगे हैं?यह संघ के लिए भी विचारणीय है|

डॉ.अभिषेक दुबे ने भी देवी अहिल्या विश्वविद्यालय इंदौर से नियमित शोधार्थी के रूप में,बिना शोध अवकाश व शोध प्रबंधन को बिना Plagiarism Certificate के जमा कर,अपने राजनीतिक पहुंच (अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के रायपुर नगर के महामंत्री के पद पर कार्यरत व वर्तमान में प्रशासनिक अकादमी निमोरा रायपुर में प्रतिनियुक्ति में तत्कालीन मुख्यमंत्री डॉ.रमन सिंह के अनुशंसा के आधार पर कार्यरत हैं) का इस्तेमाल कर,पीएचडी की फर्जी डिग्री ले ली|अभिषेक दुबे मात्र एमबीए की डिग्री की पात्रता रखते हैं,बिना नेट,पीएचडी के सहायक प्रोफेसर के पद पर अपने पिता पद्मश्री सुरेंद्र दुबे के राजनीतिक प्रभाव के कारण नियुक्त हो गए|अयोग्य होते हुए भी आज प्रदेश के प्रशासनिक ढांचे को प्रशिक्षण प्रदान कर रहे हैं|डॉ.दुबे जुगाड़ के लिए जाने जाते हैं|एमबीए की डिग्री के आधार पर विश्व विद्यालय की मीडिया प्रबंधन विभाग में नौकरी पा लिया,जबकि शैक्षणिक योग्यता मीडिया प्रबंधन का मांगा गया था,ना कि एमबीए मार्केटिंग का?अपने नौकरी में उठ रहे सवालों और 2018 में सरकार बदलने के डर से पिता श्री सुरेंद्र दुबे और भाई जो कि संसद सदस्य राजनांदगांव के ओएसडी के राज राजनीतिज्ञ रसूख से अतिथि प्राध्यापकों के हवाले कर,प्रबंधन विभाग को सत्र के मध्य में छोड़कर,प्रशासनिक अकादमी निमोरा में प्रशिक्षक के पद पर प्रतिनियुक्ति पर पदस्थ हो गया|क्या यह सहीं शिक्षक है?अगर देश में शिक्षक की परिभाषा मार्गदर्शक की है तो माफ कीजिए ये देश के सहीं मायने में गद्दार हैं।

UGC के मानक के तहत पीएचडी किसी संस्थान में कार्यरत व्यक्ति अगर वह स्वयं के कार्यरत संस्थान से बाहर पीएचडी कर रहा है,तो वह बिना अवकाश के नहीं कर सकता|परंतु डॉ.शाहिद अली ने अपने फर्जी नियुक्ति के तर्ज पर ही विश्वविद्यालय में पीएचडी की डिग्री की दुकान खोल दी है और डॉ.शाहिद अली ने अपनी नौकरी बचाने के लिए मुख्यमंत्री के करीबी के पत्नी को मुफ्त में डिग्री बांट दी|डॉ.शाहिद अली ने अनुसूचित जाति के पीएचडी शोधार्थी कमल ज्योति जाहिरे की पीएचडी सिर्फ जाति के आधार पर खारिज कर दिया|क्योंकि कमल ज्योति,डॉ.अली के योग्यता पर लगातार सवाल उठाते रहे थे|विश्वविद्यालय में जो छात्र व शोधार्थी ने विश्वविद्यालय प्रशासन के खिलाफ आवाज उठाई,उन्हें बाहर का रास्ता दिखा दिया गया या उसे फर्जी तरीके से विश्वविद्यालय में मारपीट और तोड़फोड़ के इल्जाम में पुलिस केस में फंसा दिया गया |इसका शिकार कमल ज्योति जाहिरे हुआ|

माननीय कुलपति महोदय आप अपने भाषणों में मीडिया और शिक्षा में सूचिता और सत्य की बात करते रहे हैं|आपकी आंखों के सामने विश्वविद्यालय में अयोग्य रूप से नियुक्त व्यक्तियों के द्वारा शैक्षणिक कार्य को छोड़कर,संघ के प्रचार-प्रसार का कार्य करना और कर्मचारियों द्वारा पास-फैल का खेल खेला जाना,आप धृतराष्ट्र की भूमिका में रहे हैं|आप प्रोफेसर के पद से कुछ महीने में सेवानिवृत्त हो जाएंगे,क्या अपनी अंतरात्मा की आवाज पर विश्वविद्यालय में हुए तमाम आयोग के शिक्षकों की नियुक्ति को जांच कराने का कार्य करेंगे?कुलपति महोदय विश्वविद्यालय में योग्य प्राध्यापकों की फेहरिस्त बहुत लंबी है और आप इनके संरक्षक की भूमिका में पाए गए हैं?एक बार सच के साथ खड़ा होइए,सारा देश आपको दुआएं देगा|योद्धा बनिए,आप नरेंद्र मोदी जी को अपना आदर्श मानते हैं,एक ओर मोदी जी भ्रष्टाचार से लड़ रहे हैं आप नैतिक भ्रष्टाचारियों को कब विश्वविद्यालय के पावन धरा से कब बाहर करेंगे?

साथ ही यूजीसी-नई दिल्ली विश्वविद्यालय के कुलाधिपति और उच्च शिक्षा मंत्री को पत्रकारिता विश्वविद्यालय में हुए अवैध नियुक्तियों एवं पीएचडी डिग्री के गोरखधंधे पर जांच कराकर,दोषियों को नौकरी से तुरंत बर्खास्त कर जेल भेज देना चाहिए,जिससे विश्वविद्यालय में शिक्षा और शोध में गुणवत्ता बढ़ाई जा सके।

लेख-अंकित तिवारी,छात्र
कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता एवं जनसंचार विश्वविद्यालय,रायपुर छत्तीसगढ़

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